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परिचय

विकासशीलभारत में औद्योगिकीकरण के फलस्वरूप देश का भूगोल परिवर्तनशील हो गया है। इसके कारण ग्रामीण भारत के लोग महानगरों तथा नगरों की ओर आकर्षित हो रहे हैं । ग्रेटरनोएडा, नोएडा में भी संपूर्ण भारत के विभिन्न धर्म, विभिन्नवर्ग, समुदाय, क्षेत्रों के लेग जीविकोपार्जन के लिए यहाँ आकर बसे हैं।
किन्तु महानगरों के रहन-सहन में आजकल युवाओं में बढ़ती हुई आपराधिक प्रवृत्ति एवं संस्कार हीनता उनकी चिन्ता का विषय है, और वे चाहते हैं कि उच्च व्यावसायिक ज्ञान के साथ-साथ बच्चों में नैतिकमूल्यों के प्रति श्रद्धाभाव रहे और सनातन संस्कृति में उनकी रुचि बनी रहे। प्रवासी समाज की इन अपेक्षाओं पर गम्भीरता से विचारोपरान्त महर्षि पाणिनि धर्मार्थ ट्रस्ट (रजि0) ने एक गुरुकुल पद्धति से विद्यालय प्रारम्भ करने का निर्णय लिया। जिसमें उन सभी अलग अलग क्षेत्रों की संस्कृति का आपसी समन्वय हो सके एवं उनके बच्चों की शिक्षा दीक्षा सुचारू रूप से चल सके और वे संस्कारित हो सकें। महर्षि पाणिनि धर्मार्थ ट्रस्ट (रजि0) द्वारा निःशुल्क रूप से संचालित महर्षि पाणिनि वेद-वेदांग विद्यापीठ (गुरुकुल) ग्रेटर नोएडा इसी का एक मूर्त रूप है।

संस्कृत एवं वेद ज्ञान

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ २.४७

कर्म करने मात्र में तुम्हारा अधिकार है फल में कभी नहीं। तुम कर्मफल के हेतु वाले मत होना
और अकर्म में भी तुम्हारी आसक्ति न हो।

गीता श्लोक

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देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥ २.१३

जैसे इस देह में देही जीवात्मा की कुमार युवा और वृद्धावस्था होती है
वैसे ही उसको अन्य शरीर की प्राप्ति होती है। धीर पुरुष इसमें मोहित नहीं होता है।

गीता श्लोक

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आशाया ये दासास्ते दासाः सर्वलोकस्य ।
आशा येषां दासी तेषां दासायते लोकः ॥

जो लोग इच्छाओं के सेवक हैं वे पूरी दुनिया के सेवक बन जाते हैं।
जिनके लिए इच्छा एक सेवक है उनके लिए पूरी दुनिया भी एक सेवक है।

ज्योतिष

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वृद्धसेवया विज्ञानत् ॥

वृद्ध – सेवा से सत्य ज्ञान प्राप्त होता है ।

श्लोगन

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नास्ति बुद्धिमतां शत्रुः ॥

बुद्धिमानो का कोई शत्रु नहीं होता ।

श्लोगन

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दारिद्र्यनाशनं दानं शीलं दुर्गतिनाशनम्।
अज्ञाननाशिनी प्रज्ञा भावना भयनाशिनी॥ ०५.११

दान दरिद्रता को नष्ट कर देता है। शील स्वभाव से दुःखों का नाश होता है। बुद्धि अज्ञान को नष्ट कर देती है तथा भावना से भय का नाश हो जाता है।

श्लोक

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नात्यन्तं सरलैर्भाव्यं गत्वा पश्य वनस्थलीम् ।
छिद्यन्ते सरलास्तत्र कुब्जास्तिष्ठन्ति पादपाः ॥

अपने व्यवहार में बहुत सीधे ना रहे वन में जो सीधे पेड़ पहले काटे जाते हैं
और जो पेड़ टेढ़े हैं वो खड़े हैं ।

श्लोक

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सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया: ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:ख भाग्भवेत् ॥

सभी सुखी हों सभी निरोगी हों सभी को शुभ दर्शन हों और कोई दु:ख से ग्रसित न हो

परासिद्ध

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ददाति प्रतिगृह्णाति गुह्यमाख्याति पृच्छति ।
भुङ्क्ते भोजयते चैव षड्विधं प्रीतिलक्षणम् ॥

देना लेना रहस्य बताना और उन्हें सुनना खाना
और खिलाना – ये छह प्रेम के संकेत हैं।

ज्योतिष

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वाणी रसवती यस्यएयस्य श्रमवती क्रिया ।
लक्ष्मी रू दानवती यस्यएसफलं तस्य जीवितं ।।

जिस मनुष्य की वाणी मीठी है जिसका कार्य परिश्रम से परिपूर्ण है
जिसका धन दान करने में प्रयोग होता है उसका जीवन सफल है।

परासिद्ध

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महत्वपूर्ण जानकारी

गुरुकुलीय शिक्षा पद्धति में निर्धारित शिक्षा के उद्देश्य

1-वैदिक वाङ्मय का अध्ययन एवं अनुशीलन
2- शारीरिक विकास एवं चारित्रिक विकास
3-मानवीय मूल्यों की अवधारणा को विकसित करना और आचरण में उतारना
4-वैयक्तिक और सामाजिक विकास करना
5-आध्यात्मिक विकास करना
6-संस्कृति के विकास के लिए शिक्षा
7-प्रकृति के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए शिक्षा (पंचमहाभूतों का महत्व व संरक्षण एवं संवर्धन)
8-गोपालन और पशु-पक्षी एवं जीवजगत का प्रारम्भिक परिचय
9-कृषि और वानस्पतिक ज्ञान (उत्पादन और उपयोग) पादप जगत का सामान्य परिचय महर्षि पाणिनि धर्मार्थ ट्रस्ट (रजि.) द्वारा संचालित ‘महर्षि पाणिनि वेद-वेदांग विद्यापीठ (गुरुकुल) में उपर्युक्त उद््देश्यों की पूर्ति के लिए संस्कृत तथा अन्य विषयों के साथ वेद के सभी 6-अंगों का अध्ययन कराते हैं।