वैदिक विज्ञान के अनुसार जड़ पदार्थों में भी संवेदना की स्थिति है। वैदिक अवधारण में भी प्रकृति के
प्रत्येक अंश को चेतन रूप में स्वीकार करते हैं। पंचमहाभूत (अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी, आकाश) के
गुणधर्मों के ज्ञान के साथ-साथ इनके व्यवहारिक प्रयोग और उपादेयता का ज्ञान कराते हैं। पर्वतास्तृप्यन्ताम् (गृहसू0) अन्तः संज्ञा भवन्त्येते समदुःख सुखन्वितः (मनु0), रुदन्तिपादपाः, हसन्तिपादपाः, जिघ्रन्तिपादपाः, (महाभा0)
वेद की ऋचाऐं प्रकृति के संवर्धन संरक्षण के प्रति स्वतः उन्मुख करती हैं । जिसके द्वारा छात्रों में प्रकृति (नदीसरोवर), वृक्ष, वायु एवं पशु-पक्षी, निष्ठा तथा उनके संरक्षण के बाद उनमें पूज्य का भाव भी उत्पन्न कराती हैं ‘वसुधैवकुटुम्बकम्’ की भावना से पशु,पक्षी और अन्यान्य जीवों के प्रति भी कुटुम्बवत् व्यवहार की शिक्षा प्रदान की जा रही है।

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