‘स्वरवर्णाद्युच्चारण प्रकारो यत्र शिक्ष्यते उपदिश्यते सा शिक्षा’। स्वर, (उदात्तानुदात्तस्वरित) वेद के उच्चारण की प्रक्रिया के बारे में सम्यक रूप से शिक्षित करते हैं। वेद की विशदता के अनुसारशिक्षा का क्षेत्र भी बहुत व्यापक है। शुक्लयजुर्वेदमाध्यान्दिनीय शाखा के अनुरूप अभी शुक्लप्रातिशाख्य/वाजसनेयि प्रातिशाख्य एवं पाणिनीय शिक्षा/याज्ञवल्क्य शिक्षा का भी अध्ययन कराया जा रहा है।

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